कर्णफूल श्रवणों में, मकराकृति विशाल थे,
मनुज, सुरों हित फैले, मानो मोहजाल थे।
मस्तक मणियों खचित, रत्नमाला से शोभित,
टीका अति शोभायमान, छवि मधुर अपरिमित॥
प्रस्तुति : ॐ प्रकाश विकल
कर्णफूल श्रवणों में, मकराकृति विशाल थे,
मनुज, सुरों हित फैले, मानो मोहजाल थे।
मस्तक मणियों खचित, रत्नमाला से शोभित,
टीका अति शोभायमान, छवि मधुर अपरिमित॥
प्रस्तुति : ॐ प्रकाश विकल
जीवन का अज्ञान- भी तुम
हर ज्ञानी ज्ञान भी तुम
एक किरण देकर अपनी
करते तम् का नाश भी तुम।
जीवन की बगिया हो तुम
बगिया के माली भी तुम
पावन जल से कर सिंचित
खूब बढाते रहते तुम।
जीवन की कश्ती हो तुम
कश्ती की पतवार भी तुम।
अश्रयहीन का बन संबल
पहुंचाते मंजिल पर तुम॥
जीवन की मस्ती हो तुम
मस्ती की बस्ती भी तुम।
भरकर हर प्राणी में नेह
बनते दिल की धड़कन तुम॥
ईश का रूप
मानवीय स्वरूप
चिन्तन-रूप ।
दुःखों का मूल
संसार से आशक्ति
आसक्ति ? त्याज्य ।
चीर हरण
सहज मोह भंग
प्रभु से पर्दा ?
अज्ञान नाश
शब्दों से न सत्य से
सत्य ? प्रकाश ।
हे सागर
तुम्हीं से उत्पन्न
एक लहर हूँ
तुम्हीं में विलीन
तुम्हीं में तल्लीन
चाहो तुम
दे सकते हो
एक पहचान
अन्यथा
मिटा दो
मेरा अस्तित्व
यह निर्भर
तुम्हारे ऊपर.