Thursday, January 15, 2009

विकल कवि की कविता


कर्णफूल श्रवणों में, मकराकृति विशाल थे,

मनुज, सुरों हित फैले, मानो मोहजाल थे।

मस्तक मणियों खचित, रत्नमाला से शोभित,

टीका अति शोभायमान, छवि मधुर अपरिमित॥

प्रस्तुति : ॐ प्रकाश विकल

Tuesday, January 13, 2009

बगिया के माली भी तुम


जीवन का अज्ञान- भी तुम

हर ज्ञानी ज्ञान भी तुम

एक किरण देकर अपनी

करते तम् का नाश भी तुम।

जीवन की बगिया हो तुम

बगिया के माली भी तुम

पावन जल से कर सिंचित

खूब बढाते रहते तुम।

Monday, January 12, 2009

बनते दिल की धड़कन तुम॥


जीवन की कश्ती हो तुम

कश्ती की पतवार भी तुम।

अश्रयहीन का बन संबल

पहुंचाते मंजिल पर तुम॥

जीवन की मस्ती हो तुम

मस्ती की बस्ती भी तुम।

भरकर हर प्राणी में नेह

बनते दिल की धड़कन तुम॥

Friday, January 9, 2009

मैं समय हूं

मैं समय हूं

गतिवान

चिरन्तन

सर्वशक्तिवान।

मूर्ख हो तुम,

चाहते हो

मुझे

बांधना।

रेत सम

मुटठी से तुम्हारी

फिसल रहा हूं

शनै शनै।

और

तुम्हें

कुछ

ज्ञात भी नहीं॥

ईश का रूप मानवीय स्वरूप

ईश का रूप

मानवीय स्वरूप

चिन्तन-रूप ।


दुःखों का मूल

संसार से आशक्ति

आसक्ति ? त्याज्य ।

चीर हरण

सहज मोह भंग

प्रभु से पर्दा ?


अज्ञान नाश

शब्दों से न सत्य से

सत्य ? प्रकाश ।

Wednesday, January 7, 2009

यह निर्भर तुम्हारे ऊपर.


हे सागर

तुम्हीं से उत्पन्न

एक लहर हूँ

तुम्हीं में विलीन

तुम्हीं में तल्लीन

चाहो तुम

दे सकते हो

एक पहचान

अन्यथा

मिटा दो

मेरा अस्तित्व

यह निर्भर

तुम्हारे ऊपर.

Monday, January 5, 2009